जेसिका लाल मर्डर केस में मनु शर्मा को हुई सजा को तीन साल कम कर दिया गया। उसे 2023 में जेल से बाहर आना था लेकिन वह सोमवार को तिहाड़ जेल से रिहा हो गया। मनु ने 16 साल 11 महीने जेल में बिताए हैं। जबकि 2017 से वह ओपन जेल में है। वैसे, अप्रैल के पहले हफ्ते से मनु यूं भी कैदियों को सोशल डिस्टेंसिंग देने के इरादे से पैरोल पर जेल से बाहर है।
जिस अच्छेकाम का हवाला देकर मनु को जल्दी रिहा किया गया है, उसमें ज्यादातर जेल को आर्थिक फायदा पहुंचाने वाले आइडिया शामिल हैं। जेल में सजा काटने के दौरान ही मनु शर्मा ने अपना कारोबार चलाया, शादी की और उसका एक बेटा भी है।
22 अप्रैल 2015 को जेसिका की हत्या के 16 साल बाद मनु ने मुंबई की एक मॉडल और अपनी पुरानी दोस्त प्रीती से शादी कर ली। इस दौरान वह पैरोल पर छूटा था। एक बार मनु अपनी मां की बीमारी का बहाना बनाकर पैरोल पर छूटा था। लेकिन बाद में मनु की मां चंडीगढ़ में पार्टी करती पाई गईं थीं।
सूत्रों के मुताबिक, मनु शर्मा ने जेल के अधिकारियों के बच्चों को अपने दफ्तरों में नौकरियां दिलवाई हैं और जेल स्टाफ के ऐशो आराम के लिए कई बार अपनी होटलें खोली हैं।
अच्छे व्यवहार का हवाला देकर ही मनु को ओपन जेल में रहने की छूट मिली थी। मनु शर्मा 2017 से ही ओपन जेल में रह रहा था। ओपन जेल यानी काम धंधा करने जेल से बाहर जाने की इजाजत। उसे ओपन जेल में सुबह 8 से शाम 8 बजे तक जेल से बाहर जाने की इजाजत थी। इस दौरान मनु नेहरू प्लेस स्थित अपने दफ्तर जाता था। जेल में रहते मनु ने बेधड़क अपना बिजनस चलाया जिसमें अखबार, टीवी चैनल और होटल शामिल हैं।
यही नहीं जेल में रहते मनु को 2012-13 के आसपास हर साल 7 हफ्ते की सरकारी छुट्टी भी मिलने लगी थी। फर्लो की ये छुटि्टयां उसे तीन, दो और फिर दो हफ्ते की किश्तों में मिलती थी। ये छुटि्टयां भी उसे अच्छे व्यवहार का हवाला देकर ही मिलीं थीं। ऐसी ही एक छुट्टी के दौरान मनु की कमिश्नर के बेटे के साथ झड़प हो गई थी। मनु दिल्ली के सम्राट होटल में शराब पी रहा था और उसकी लड़ाई हो गई।
2016 तक तिहाड़ जेल के लॉ ऑफिसर रहे सुनील गुप्ता के मुताबिक, 2015 में अच्छे व्यवहार की वजह से ही उसे पहले सेमी ओपन जेल में भेजा गया था, जिसमें जेल कॉम्प्लेक्स के अंदर काम करना होता है। मनु के जिम्मे जेल की दुकानों का हिसाब किताब देखना होता था।
मनु शर्मा ने जेल के प्रोडक्ट्स बेचने को नए-नए आइडिए दिए थे। तिहाड़ जेल के प्रोडक्ट्स टीजे के नाम से बिकते हैं।
तिहाड़ जेल केबिजनेस को बढ़ाने के लिए मनु ने आउटलेट बाहर खोलने का सुझाव दिया था। जेल प्रशासनने इसके बाद ही दिल्ली के छह कोर्ट कॉम्पलेक्स में दुकान खोलीं थीं। मनु ने मसाले बनाने और बाकी फैक्ट्री लगाने की स्ट्रैटेजी भी बनाई थी। उसने अपने गुनाहों को धोने के लिए एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया था, जिसके जरिए वह कैदियों के बच्चों की पढ़ाई फीस भरता था।
दिल्ली के स्कूलों में जितनी भी लकड़ी की डेस्क इस्तेमाल होती है, वह तिहाड़ में बनती हैं। उससे ही जेल को सबसे ज्यादा रेवेन्यू मिलता है। ये सुझाव सरकार को देने का आइडिया मनु का ही था। जिसके बाद से दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों के लिए ये नियम बना दिया किवह लकड़ी की डेस्क सिर्फ तिहाड़ से खरीदेंगे।
2008-09 में यह नियम लागू होने के कुछ साल के भीतर दिल्ली तिहाड़ का रेवेन्यू 4-5 करोड़ से करीब 17 करोड़ रु. हो गया था। तिहाड़ जेल का सालाना टर्नओवर लगभग 30 करोड़ रु. का है। जिसमें बेकरी से 5 करोड़, लकड़ी की डेस्क से 12-13 करोड़ और बाकी कैमिकल, फैब्रिक, मसाले, तेल, साबुन से है।
29 अप्रैल 1999 की रात को मनु शर्मा ने 34 साल की मॉडल जेसिका लाल की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी थी क्योंकि जेसिका ने उसे शराब देने से मना कर दिया था।
मेरा सफर सोमवार रात 9.15 बजे भोपाल के हबीबगंज स्टेशन से शुरू हुआ था, जो बुधवार को सुबह 7.30 बजे यहीं खत्म हुआ। 1400 किमी की इसयात्रा के उन अनुभवों के बारे में बता रहा हूं, जो ट्रेन में सफर करने के दौरान आपके काम आ सकते हैं।
हबीबगंज स्टेशन : सोमवार शाम 6 से रात 8.15 बजे तक
दो घंटे तक लाइन में लगे रहे, जिनके पास लगैज ज्यादा था वो परेशान हुए
हबीबगंज स्टेशन से सोमवार रात नौ बजे ट्रेन थी लेकिन यात्री शाम 6 बजे से ही स्टेशन के बाहर जुटना शुरू हो गए थे, क्योंकि सभी को यह लग रहा था कि लंबी प्रॉसेस है। मैं भी 6 बजे पहुंच गया था क्योंकि पता नहीं था कि रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद क्या होगा।कितना वक्त लगेगा।
6 बजे से ही प्लेटफॉर्म नंबर 1 के सामने लाइन लग गई थी, जो लोग 6 बजे के भी पहले आए थे, वो सबसे आगे खड़े थे, जो बाद में आए वो पीछे लगतेगए। देखते ही देखते चार लाइनें लग गईं।
स्टेशन के सामने इस तरह से यात्रियों की लाइनें लगी थीं।
लंबी लाइन होने के बावजूद यात्रियों की एंट्री 7.30 बजे तक भी शुरू नहीं हो सकी थी, क्योंकि थर्मल स्क्रीनिंग करने वाले डॉक्टर आ नहीं पाए थे।
इधर गर्मी में लाइन में लगे यात्रियों की हालत खराब हो रही थी। सबसे ज्यादा तकलीफ में बच्चे और बुजुर्ग थे। जिन लोगों के पास ज्यादा लगैज था, उनके लिए दोहरी चुनौती थी।
8 बजे के करीब डॉक्टर आए तो एंट्री शुरू हुई। एंट्री गेट पर तीन कर्मचारी बैठे थे। एक नाम-नंबर नोट कर रहा था। दूसरा उसका सहयोगी था। तीसरा डॉक्टर था जो थर्मल स्क्रीनिंग कर रहा था।
आरपीएफ के जवान भी तैनात थे। जो लोग नियम तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें पुलिस के गुस्से का सामना करना पड़ रहा था।
कॉन्टेक्टलैस टिकट का सिस्टम लगा जरूर लेकिन काम नहीं कर सका
कॉन्टैक्टलेस टिकट चेकिंग के लिए कैमरा और स्क्रीन स्टेशन के एंट्री गेट पर लगा दी गई है।
एंट्री गेट पर एक स्क्रीन लगी थी। नीचे कैमरा लगा था। वहां खड़े कर्मचारी से पूछा कि ये क्या है। जवाब मिला, यह सिस्टम कॉन्टैक्टलेस टिकट चेकिंग के लिए लगाया गया है।
यात्रियों को कैमरे के सामने टिकट दिखाना होगा। ऐसा करते ही टिकट स्क्रीन पर नजर आएगी और रेलवे के रिकॉर्ड में सेव हो जाएगी।
इसके बाद टीटीई को ट्रेन में यात्री की टिकट चेक नहीं करनी होगी। हालांकि, सोमवार को कुछ तकनीकी गड़बड़ी होने से हबीबगंज स्टेशन पर यह सिस्टम शुरू नहीं हो सका।
अधिकारियों ने बताया एक-दो दिन में काम करने लगेगा। जो लोग प्लेटफॉर्म पर पहुंच रहे थे, उन्हें फिर वहां बनाए गए गोलों में खड़ा होना पड़ रहा था।
लाइन से ही ट्रेन में एक-एक करके जाना था। पुलिसकर्मी लाइन लगवाने के लिए तैनात थे। हालांकि कई यात्री सीधे ही चढ़ गए।
भोपाल एक्सप्रेस में सोमवार रात 8.15 बजे से मंगलवार सुबह 8 बजे तक
यात्रियों ने खुद अपनी सीट सैनिटाइज की
ट्रेन में एंट्री करने के बाद कुछ यात्री अपने साथ स्प्रे लाए थे, उससे पहले उन्होंने अपनी सीट को सैनिटाइज किया। सामान सैनिटाइज किया। इसके बाद ही बैठे।
जिनके पास स्प्रे नहीं था, वो ऐसे ही बैठ गए। रेलवे अभी बेडरोल की सुविधा नहीं दे रहा इसलिए एसी में रिजर्वेशन करवाने वाले भी चादर और तकिया अपने साथ लाए थे।
यात्रियों ने खुद अपनी सीट को सैनिटाइज किया। फिर चादर बिछाकर सोए।
एसी के डिब्बों में तो थोड़ी बहुत डिस्टेंसिंग फॉलो हो भी रही थी लेकिन, जनरल और स्लीपर कोच के हालात बहुत खराब थे। एक सीट पर पहले की तरह चार-चार, पांच-पांच यात्री बैठे थे।
स्टेशन पर एंट्री के दौरान मास्क सभी ने लगाया था लेकिन, ट्रेन में चढ़ने के बाद गर्मी के चलते अधिकतर ने उतार दिया।
जो लोग अपने साथ पीने का पानी नहीं लाए, उन्हें कई घंटों प्यासा ही रहना पड़ा क्योंकि पहले की तरह ट्रेन में अभी खाने-पीने को कुछ नहीं खरीदा जा सकता।
हालांकि, प्लेटफॉर्म से पीने का पानी भरा जा सकता है लेकिन कोरोना संक्रमण के डर की वजह से यात्री बाहर का पानी भरने से बचते दिखे।
ट्रेन लगभग आधी खाली थी, फिर भी स्लीपर क्लास में सोशल डिस्टेंसिंग फॉलो नहीं हुई। ट्रेन में 8 की जगह 3 ही टीटीई थे, इसलिए वे स्लीपर कोच में जांच के लिए गए ही नहीं। एसी कोच में उन्होंने जांच की।
ये भी बताया गया कि स्टेशन पर जांच-पड़ताल हो गई है। आधा स्टाफ वहां भी तैनात है इसलिए ट्रेन में यह करने की जरूरत नहीं है।
झांसी, आगरा जैसे स्टेशनों पर कुछ ज्यादा यात्री उतरे, यहां से थोड़े ज्यादा चढ़े भी। बाकि सभी जगह इक्का-दुक्का ही उतरे और चढ़े।
हजरत निजामुद्दीन स्टेशन : मंगलवार सुबह 8 से रात 8.45 बजे तक
पहले ही तरह लग गई भीड़, पुलिस को देखकर लगे लाइन में
निजामुद्दीन स्टेशन से निकलते वक्त यात्री ऐसे गुत्थमगुत्था हो गए थे।
ट्रेन अपने तय समय पर सुबह 8 बजे दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुंच गई। यात्रियों ने उतरने में किसी तरह की डिस्टेंसिंग फॉलो नहीं की। पहले की तरह भीड़ एक साथ उतरी और ओवरब्रिज की तरफ चल पड़ी।
आगे पुलिसकर्मी तैनात थे जो लाइन लगवा रहे थे, फिर सब लाइन में लग गए। लाइन में लगकर सब बाहर हो गए। यहां किसी तरह की पूछताछ नहीं की गई।
बाहर निकलते ही फिर यात्री आपस में गुत्थमगुत्था हो गए। काली-पीली, ऑटो खड़े थे जो बिना सोशल डिस्टेंसिंग को फॉलो करते हुए चार-चार, पांच-पांच यात्रियों को भरकर ले जा रहे थे।
आरपीएफ जवानों को देख निजामुद्दीन में एग्जिट गेट के सामने यात्रियों ने लाइन बना ली थी।
एक से डेढ़ घंटे में सभी यात्री स्टेशन से जा चुके थे और स्टेशन वीरान था। बारह बजे के करीब दूसरी ट्रेन आई, तब फिर एकदम से भीड़ जुटी।
बहुत से यात्री निजामुद्दीन से दिल्ली स्टेशन गए। उनकी अगली ट्रेन से वहां से थी। कई अपनी अगली ट्रेन के इंतजार में स्टेशन के बाहर ही यहां-वहां आराम करते रहे।
मंगलवार को शाम पौन नौ बजे निकलने वाली भोपाल एक्सप्रेस शाम साढ़े पांच बजे ही प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी।
बाहर से आने वाले यात्रियों का सिर्फ टेम्प्रेचर चेक किया जा रहा था। न कोई सोशल डिस्टेंसिंग थी और न ही किसी तरह की जांच पड़ताल।
ट्रेन तय समय पर निजामुद्दीन से हबीबगंज के लिए निकल गई। डी-4 कोच का एसी खराब हुआ तो यात्रियों को दूसरे कोच में शिफ्ट किया गया।
ट्रेन आधी ही भरी थी इसके बावजूद स्लीपर कोच के हालात बहुत खराब थे। यहां कोई डिस्टेंसिंग फॉलो नहीं हो रही थी। पहले की तरह एक सीट पर चार से पांच यात्री तक बैठे थे।
आते वक्त भी वही तीन टीटीई ट्रेन में थे, जो यहां से जाते वक्त गए थे। यात्री चर्चा कर रहे थे कि दिल्ली में तो कोई जांच-पड़ताल नहीं हुई। पूरी दिल्ली खुल गई। ऐसे में कैसे कोरोना से बच पाएंगे।
हबीबगंज स्टेशन : बुधवार सुबह 7.05 बजे से 9 बजे तक
हबीबगंज स्टेशन से बाहर निकलते वक्त इस तरह यात्रियों की भीड़ लग गई। जांच के लिए आगे लाइन लगी थी।
ट्रेन तय वक्त पर सुबह 7.05 बजे हबीबगंज पहुंच चुकी थी। प्लेटफॉर्म नंबर-1 और 5 दोनों ही तरफ के एक-एक पॉइंट खोले गए थे। यहां भी यात्रियों ने भीड़ लगा ली।
जहां चेकिंग चल रही थी, वहां से चंद कदमों दूर से लाइन लगी थी। हर एक यात्री का नाम, नंबर नोट किया गया। टेम्प्रेचर चेक किया गया। इस प्रॉसेस में दो-ढाई घंटे लग गए।
7 बजे हबीबगंज पहुंच चुके यात्री साढ़े आठ बजे तक स्टेशन से निकल सके। जो ट्रेन से जल्दी उतरकर पहले लाइन में लग गए थे, वो पहले निकल गए। बाकि करीब दो घंटे तक भीड़ में फंसे रहे।
ऑटो अब भोपाल में भी शुरू हो चुके हैं। तो यात्रियों को स्टेशन से अपने घर जाने में किसी तरह की तकलीफ नहीं हुई।
बॉक्सिंग की 6 बार की विश्व चैंपियन मैरीकॉम के कोच छोटे लाल यादवको बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ से द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। छोटेलाल यादव वर्तमान में सेना में कार्यरत हैं और उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पहाड़ी गांव के निवासी हैं।
फेडरेशन नेछोटेलाल के साथ रेलवे के मोहम्मद अली कमर के नाम की भी सिफारिश की है। इन्हीं दो नामों में से किसी एक को यह अवार्ड मिलेगा। सेना में 2005 से ही सूबेदार के पद पर तैनात छोटेलाल लॉकडाउन के बाद से ही अपने घर ही हैं।
खास बात है कि मैरीकाॅम से छोटेलाल 4 साल छोटे हैं। छोटेलाल की उम्र 33 साल औरमेरी कॉमकी 37 साल है। मैरीकॉम कोच छोटेलाल को इतना मानती है कि उनकी कोचिंग में जीते गए कई गोल्ड मेडल के बाद उन्होंने अपने ग्लव्सको बेस्ट विशेज के रूप में ही दे दिया।
दैनिक भास्कर से उन्होंने मैैरीकॉम और अपने जीवन से जुड़े दिलचस्प संघर्षों की कहानी बयां की।
जानिए उनकी कहानी उनकी ही जुबानी...
दस साल की उम्र में ही ट्रायल देने पहुंच गया
छोटे लाल यादव ने बताया, "मैं 10 साल की उम्र में ही सिगरा स्टेडियम में ट्रायल देने पहुंच गया था और मेरासिलेक्शनभी हो गया। पिता राधा कृष्ण यादव रेलवे मेंक्लास थ्री कर्मचारी के पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने 1998-99 में मुझे 10-11 साल की उम्र में दौड़ लगवाना शुरू किया था।
इसी साल सिगरा स्टेडियम में पुणे की स्पोर्ट्स कंपनी द्वारा ट्रायल चल रहा था। मुझे एक लड़के ने इसके बारे में बताया था। मैं भी पापा से पूछकर ट्रॉयल देने पहुंच गया। दर्जनों बच्चो में मैंने टॉप किया। फिर मुझे कुछ ही दिनों बाद पुणे में ट्रायल को बुलाया गया। पुणे के ट्रायल में मैंने फिर से परफॉर्मेंस को देखते हुए स्पोर्ट्स कम्पनी (आर्मी ही देखती है) में सिलेक्ट हो गया।"
इस तस्वीर में मैरीकॉम के साथ उनके कोच छोटेलाल यादव।
स्विमर से बॉक्सर बनने कहानी
"पुणे में कुछ महीनों तकमैं तैराकी केे अभ्यास में जुटा रहा।कोच नेफुर्ती और परफॉर्मेंस को देखते हुए मुझे बॉक्सर बनाने का फैसला किया। 11 साल के बच्चों की टीम से मुझे 12 साल की बच्चों की टीम में शिफ्ट कर दिया। यहीं से बॉक्सिंग का करियर शुरू हो गया।
साल 2000 में 14 साल की उम्र मेंमहाराष्ट्र को-स्टेट चैंपियनशिप में गोल्ड जीता और एक साल तक बेस्ट मुक्केबाज बना रहा। पापा मुझे उस समय भी 500 रुपये भेजा करते थे।"
सुनील दत्त ने पहलागोल्ड जीतने पर दिए थे50 हजार रुपए
"उसके बाद एशियन कैडेट बॉक्सिंग चैंपियनशिप वियतनाम 2004 में पहला गोल्ड 15-16 साल की उम्र में जीता था, उस समय के खेल मंत्रीसुनील दत्त ने महराष्ट्र आने पर पहली बार 50 हजार का नगद पुरस्कारदेकर सम्मानित किया था।
जब मुझे स्विमिंग से बॉक्सिंग में शिफ्ट किया गया तो साथियों और सीनियर खिलाड़ियों ने खूब ताने दिए। वो मुझे बोलते थे कभी इंटरनेशनल नहीं खेल पाओगे। प्रैक्टिस के बाद जिम में ही सो जाया करता था। मुझे जुनून सवार हो गया, इंडिया के लिए खेलने का। जब सपना पूरा हुआ तो उन्हीं साथियों ने गले लगाया।"
ट्रेनिंग के लिए पिता ने पीएफ का पैसा दिया
"जीवन का सबसे यादगार किस्सा तब आया, जब ट्रेनिंग के लिए 2003 में उज्बेकिस्तान गया। सभी खिलाड़ी घरों से पैसे मंगा रहे थे। मैने भी पापा से पैसे के लिए कहा था। उन्होंने दो-तीन दिनों के अंदर ही 10 हजार रुपए मेरे पास भेज दिए। ट्रेनिंग के दौरान मेरे कोच ने बताया कि पापाने पीएफ तोड़कर पैसेभेजेहैं। इसे खर्च मत करो। कुछ पैसे खर्च हुए थे। बाकी पैसे लौटकर पिताजी को वापस कर दिए। उसी दिन समझ गया पिताजी किस कष्ट से परिवार को संभाल रहे है।"
तस्वीर में एक टूर्नामेंट में मैरीकाॅम का हौसला बढ़ाते उनके कोच छोटेलाल यादव।
मैरीकॉम के साथ टूर्नामेंट खेलने को मिला
उन्होंने बताया कि 2010 एशियन गेम चाइना में मैरीकॉम के साथ खेलने गया था। वह मेडल जीतकर आईंऔरमैं हार गया। 2012 लंदन ओलंपिक में मैरीकॉमकाचयन हो चुका था। मेरा सिलेक्शन भी इंडियन टीम कैंप में हुआ था। अचानक इंजरी की वजह से मुझे कैंप से बाहर होना पड़ा था। 2012 और 2013 आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूटपुणे में सहायक कोच के रूप में काम करता रहा।
2014 में एनएस एनआईएस(नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्पोर्ट्स ) करने पटियाला चला गया और वहां पढ़ाई में डिप्लोमा करते हुए भी टॉप किया। 2015 में भारतीय महिला मुक्केबाज टीम के कोच के लिए ऑफर आ गया और मैरीकॉम की ट्रेनिंग का जिम्मा मिला।
मेरे कोच बनने के बाद मैरीकॉम ने कई गोल्ड जीते
कोच बनने के बाद एशियन चैंपियनशिप वियतनाम 2017 में मैरीकॉमको गोल्ड, फिर कामनवेल्थ गेम्सऑस्ट्रेलिया 2018 में गोल्ड, 2018 में वर्ल्ड चैंपियनशिप दिल्ली में गोल्ड, वर्ल्ड चैंपियनशिप रूस2019 में ब्रांच मेडल,फिर टोक्यो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई भी कर लिया, जो कोरोना के चलते टल गया है। अब यह 2021 में होगा।
मैरीकॉम का कोच बनने के बाद यादगार किस्से
2017 में मंगोलिया में इंटरनेशनल टूर्नामेंट में मैरीकॉमनॉर्थ कोरिया के बॉक्सर सेहार गईं थी। लेकिन, मेरे कमरे मेंआकर बोली कि कोच ट्रेनिंग के लिए चला जाए। वहां 40 मिनट रनिंग करके घण्टों पहाड़ों पर प्रैक्टिस की। वहां से इंडिया आकर जमकर तैयारी कीऔर उसी नार्थ कोरिया के प्लेयर को वियतनाम में एशियन चैम्पियनशिप 2017 में हराकर गोल्ड जीता।
कॉमनवेल्थ गेम ऑस्ट्रेलिया 2018 में बहुत से प्लेयर मेडल के बाद कई दिनों तक जश्न मनातेरहे। मैरी गोल्ड जीतने के बाद अगले दिन सुबह फिर ट्रेनिंग को मेरे पास आ गईंऔर बोली इसे ब्रेक नहीं करना है। खेल के प्रति उनका जूनून गजब का है।
छोटे लाल का इंटनेशनल परफार्मेंस
इंटरनेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2003 दिल्ली -सिल्वर
इंटरनेशनल बॉक्सिंग चैम्पियनशिप नई दिल्ली 2004 -सिल्वर
वैक्सीन ट्रायल की रेस में लगे वैज्ञानिकों को कोरोना हॉटस्पॉट में ऐसे लोगों की तलाश है जो वॉलेंटियर बन सके। अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों का कहना है कि सख्ती से लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग लागू होने के बाद मामलों में कमी आई है। ऐसे मेंअब यहां वैक्सीन ट्रायल केलिए हॉटस्पॉट की कमी होतीजा रही है।
चीन से भी तीनदिन पहले ऐसी ही खबर मिली थी किवहां भी पर्याप्त संख्या में वॉलेंटियर नहीं मिल रहे।संभावना है किटेस्टिंग के लिए पश्चिमी देशों केवैज्ञानिक अफ्रीका और लेटिन अमेरिका जा सकते हैं।
क्या कहते हैं वैज्ञानिक
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के डायरेक्टर फ्रांसिस कोलिंस का कहना है कि यह अजब स्थिति है, अगर हम कोरोना हॉटस्पॉट में बचाव के तरीके अपनाकर संक्रमणघटा रहेहैं तो परीक्षण करना कठिन हो जाएगा।
ब्रिटेन के वारविक बिजनेस स्कूल की ड्रग एक्सपर्ट आयफर अली का कहना है कि लोगों का ट्रायल में शामिल होना जरूरी है, ऐसे में संक्रमण का रिस्क लेना होगा। अगर कोरोनावायरस अस्थायी तौर पर खत्म हो गया तो पूरी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी। ऐसी स्थिति में ट्रायल उन क्षेत्रों में शिफ्ट करना होगा, जहां कम्युनिटी संक्रमण के मामले दिख रहे हैं, जैसे ब्राजील और मैक्सिको।
ऐसाइबोला के समय भी हुआ था
कोरोना के मामले ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका में अधिक थे, अब संक्रमण फैलने की दर गिर रही है। ट्रायल के लिए पर्याप्त मरीज नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसी ही स्थिति 2014 में इबोला के समय भी पश्चिमी अफ्रीका में बनी थी। वैक्सीन महामारी के अंतिम दौर में तैयार हुई थी और टेस्टिंग के लिए मरीज नहीं मिल रहे थे।
अब आगे क्या
अमेरिकी कम्पनी मॉडर्मा और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को दूसरे चरण का ट्रायल करना है। अमेरिका जुलाई में 20 हजार से 30 हजार लोगों पर वैक्सीन का ट्रायल करेगा। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के डायरेक्टर फ्रांसिस कोलिंस के मुताबिक, अगर यहां तेजी से मामले गिरते हैं तो ट्रायल के लिए दूसरे देशों का रुख करना होगा। अमेरिकी सरकार पहले भी अफ्रीका में एचआईवी, मलेरिया और टीबी की वैक्सीन का ट्रायल कर चुकी है।
रोकना पड़ सकता है ट्रायल
प्रोफेसर कोलिंसके मुताबिक, अफ्रीका में कोरोना के मामले काफी बढ़रहे हैं। हम वहां ट्रायल के लिए जा सकते हैं और नई जानकारी सामने ला सकते हैं। वैक्सीन तैयार करने वाले ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े जेनर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टहडर एड्रियन हिल का कहना है कि ट्रायल के लिए 10 हजार लोगों की जरूरत है।
ब्रिटेन में मामले घटने के कारण पर्याप्त लोग नहीं मिले तो ट्रायल रोकना पड़ सकता है।
कैसे होता है वैक्सीन का ट्रायल
वैक्सीन ट्रायल में शामिल होने वाले लोगों को रेंडमली दो समूहों में बांटा जाता है- ट्रीटमेंट ग्रुप और कंट्रोल ग्रुप। ट्रीटमेंट ग्रुप पर वैक्सीन का ट्रायल होता है। कंट्रोल ग्रुप को सामान्य इलाज दिया जाता है।
सभी प्रतिभागियों को कोरोना प्रभावित क्षेत्रों में भेजा जाता है। इसके बाद इनमें संक्रमण होने की दर का मिलान किया जाता है। ट्रीटमेंट ग्रुप को वैक्सीन दी जाती है। अगर कंट्रोल ग्रुप में संक्रमण गंभीर रूप ले रहा है तो इसका मतलब है दूसरे ग्रुप में वैक्सीन का असर हो रहा है।
महामारी विशेषज्ञों ने कोरोनावायरस और तापमान के बीच एक और नयाकनेक्शन ढूंढ़ाहै। उनका कहना है कि कोविड-19 सर्दियों की मौसमी बीमारी बन सकती है, जैसे-जैसे नमी कम होगी, इसके मामले बढ़ सकते हैं। आसपासनमी घटने पर वायरस के कण हल्के और बारीक हो जाते हैं, इसलिए संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
यह बात सिडनी यूनिवर्सिटी और शंघाई की फूडान यूनिवर्सिटी ऑफ पब्लिक हेल्थ की संयुक्त रिसर्च में सामने आई है। दक्षिणी गोलार्ध मेंतापमान और कोरोनावायरस पर हुई यह अपनी तरह की पहली रिसर्च है।
ऐसे हुई रिसर्च
माइकल के मुताबिक, पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध वाले हिस्से में जब नमी कम होना शुरू होती है तो सतर्क रहना जरूरी है। सिडनी में कोविड-19 के 749 मरीजों पर 26 फरवरी से 31 मार्च तक रिसर्च चली।
शोधकर्ताओं ने मरीजों के आसपास मौसम केंद्र से स्थिति समझी। इस दौरान बारिश, नमी और जनवरी से मार्च के तापमान केआंकड़ेजुटाए गए। मरीजों की संख्या, मौसम और संक्रमणके अन्य पैरामीटर्स के एनालिसिस सेसामने आया कि वायरस का संक्रमण फैलने में नमी अहम रोल अदा करती है।
कम नमी वाला तापमान मामले बढ़ा सकता है
ट्रांसबाउंड्री और इमर्जिंग डिसिसेज़जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, चीन, यूरोप, उत्तरी अमेरिका में महामारी सर्दियों के दिनों में फैली। प्रोफेसर माइकल कहते हैं, सर्दियों से भी ज्यादा अहम है कम नमी वाला तापमान। यह मामले बढ़ाने का काम कर सकता है।
तर्क- नमी घटने पर वायरस के कण छोटे हो जाते हैं
शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में तर्क दिया है कि जब नमी घटती है और हवा शुष्क होती है तो वायरस के कण और बारीक हो जाते हैं। इस दौरान किसी के छींकने या खांसने पर ये कण हवा में लम्बे समय में टिके रहते हैं। ये स्वस्थ लोगों में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं। वहीं, जब हवा में नमी बढ़ती है तो ये कण बड़े और भारी होने के कारण नीचे गिर जाते हैं।
सर्दी में लक्षण दिखने पर तुरंट अलर्ट हों
सिडनी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल वार्ड के मुताबिक, कोविड-19 सर्दियों की मौसम बीमारी बन सकती है। अगर सर्दी का मौसम है इसके लक्षण दिखते हैं तो अलर्ट होने की जरूरत है। शोधकर्ताओं का दावा है कि हॉन्ग-कॉन्ग में कोविड-19 और सउदी अरब में मेर्स के मामलों का जलवायु से कनेक्शन ढूंढा गया है।